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25 motivational kavita in hindi – Motivation poems in hindi

motivational kavita in hindi #1 उधार / अज्ञेय – अज्ञेय

सवेरे उठा तो धूप खिल कर छा गई थी
और एक चिड़िया अभी-अभी गा गई थी।

मैनें धूप से कहा: मुझे थोड़ी गरमाई दोगी उधार
चिड़िया से कहा: थोड़ी मिठास उधार दोगी?
मैनें घास की पत्ती से पूछा: तनिक हरियाली दोगी—
तिनके की नोक-भर?
शंखपुष्पी से पूछा: उजास दोगी—
किरण की ओक-भर?
मैने हवा से मांगा: थोड़ा खुलापन—बस एक प्रश्वास,
लहर से: एक रोम की सिहरन-भर उल्लास।
मैने आकाश से मांगी
आँख की झपकी-भर असीमता—उधार।

सब से उधार मांगा, सब ने दिया ।
यों मैं जिया और जीता हूँ
क्योंकि यही सब तो है जीवन—
गरमाई, मिठास, हरियाली, उजाला,
गन्धवाही मुक्त खुलापन,
लोच, उल्लास, लहरिल प्रवाह,
और बोध भव्य निर्व्यास निस्सीम का:
ये सब उधार पाये हुए द्रव्य।

रात के अकेले अन्धकार में
सामने से जागा जिस में
एक अनदेखे अरूप ने पुकार कर
मुझ से पूछा था: “क्यों जी,
तुम्हारे इस जीवन के
इतने विविध अनुभव हैं
इतने तुम धनी हो,
तो मुझे थोड़ा प्यार दोगे—उधार—जिसे मैं
सौ-गुने सूद के साथ लौटाऊँगा—
और वह भी सौ-सौ बार गिन के—
जब-जब मैं आऊँगा?”
मैने कहा: प्यार? उधार?
स्वर अचकचाया था, क्योंकि मेरे
अनुभव से परे था ऐसा व्यवहार ।
उस अनदेखे अरूप ने कहा: “हाँ,
क्योंकि ये ही सब चीज़ें तो प्यार हैं—
यह अकेलापन, यह अकुलाहट,
यह असमंजस, अचकचाहट,
आर्त अनुभव,
यह खोज, यह द्वैत, यह असहाय
विरह व्यथा,
यह अन्धकार में जाग कर सहसा पहचानना
कि जो मेरा है वही ममेतर है
यह सब तुम्हारे पास है
तो थोड़ा मुझे दे दो—उधार—इस एक बार—
मुझे जो चरम आवश्यकता है।

उस ने यह कहा,
पर रात के घुप अंधेरे में
मैं सहमा हुआ चुप रहा; अभी तक मौन हूँ:
अनदेखे अरूप को
उधार देते मैं डरता हूँ:
क्या जाने
यह याचक कौन है?

उधार / अज्ञेय – अज्ञेय

motivational kavita in hindi #2 नया कवि : आत्म-स्वीकार / अज्ञेय – अज्ञेय

किसी का सत्य था,
मैंने संदर्भ में जोड़ दिया ।
कोई मधुकोष काट लाया था,
मैंने निचोड़ लिया ।

किसी की उक्ति में गरिमा थी
मैंने उसे थोड़ा-सा संवार दिया,
किसी की संवेदना में आग का-सा ताप था
मैंने दूर हटते-हटते उसे धिक्कार दिया ।

कोई हुनरमन्द था:
मैंने देखा और कहा, ‘यों!’
थका भारवाही पाया –
घुड़का या कोंच दिया, ‘क्यों!’

किसी की पौध थी,
मैंने सींची और बढ़ने पर अपना ली।
किसी की लगाई लता थी,
मैंने दो बल्ली गाड़ उसी पर छवा ली ।

किसी की कली थी
मैंने अनदेखे में बीन ली,
किसी की बात थी
मैंने मुँह से छीन ली ।

यों मैं कवि हूँ, आधुनिक हूँ, नया हूँ:
काव्य-तत्त्व की खोज में कहाँ नहीं गया हूँ?
चाहता हूँ आप मुझे
एक-एक शब्द पर सराहते हुए पढ़ें ।
पर प्रतिमा–अरे, वह तो
जैसी आप को रुचे आप स्वयं गढ़ें ।

नया कवि : आत्म-स्वीकार / अज्ञेय – अज्ञेय

motivational kavita in hindi #3 सत्य तो बहुत मिले / अज्ञेय – अज्ञेय

खोज़ में जब निकल ही आया
सत्य तो बहुत मिले ।

कुछ नये कुछ पुराने मिले
कुछ अपने कुछ बिराने मिले
कुछ दिखावे कुछ बहाने मिले
कुछ अकड़ू कुछ मुँह-चुराने मिले
कुछ घुटे-मँजे सफेदपोश मिले
कुछ ईमानदार ख़ानाबदोश मिले ।

कुछ ने लुभाया
कुछ ने डराया
कुछ ने परचाया-
कुछ ने भरमाया-
सत्य तो बहुत मिले
खोज़ में जब निकल ही आया ।

कुछ पड़े मिले
कुछ खड़े मिले
कुछ झड़े मिले
कुछ सड़े मिले
कुछ निखरे कुछ बिखरे
कुछ धुँधले कुछ सुथरे
सब सत्य रहे
कहे, अनकहे ।

खोज़ में जब निकल ही आया
सत्य तो बहुत मिले
पर तुम
नभ के तुम कि गुहा-गह्वर के तुम
मोम के तुम, पत्थर के तुम
तुम किसी देवता से नहीं निकले:
तुम मेरे साथ मेरे ही आँसू में गले
मेरे ही रक्त पर पले
अनुभव के दाह पर क्षण-क्षण उकसती
मेरी अशमित चिता पर
तुम मेरे ही साथ जले ।

तुम-
तुम्हें तो
भस्म हो
मैंने फिर अपनी भभूत में पाया
अंग रमाया
तभी तो पाया ।

खोज़ में जब निकल ही आया,
सत्य तो बहुत मिले-
एक ही पाया ।

काशी (रेल में), 15 फरवरी, 1954

सत्य तो बहुत मिले / अज्ञेय – अज्ञेय

motivational kavita in hindi #4 अपना काम / अजित कुमार – अजित कुमार

चीख़-चीख़ कर उन्होंने
दुनिया-भर की नींद हराम नहीं कर दी
नाक चढ़ा, भौं उठा
सबको नीचे नहीं गिराया
पूरी सुबह के दौरान
एक बार भी मुँह नहीं फुलाया
कोप-भवन में जाने की ज़रूरत नहीं समझी…

सचमुच सुखद था यह देखना कि
औरतें कितनी मगन हो
अपने–अपने काम में लगी हैं…

गिनती भूल चुके बूढ़े को
वह चार के बाद पाँच का गुटका
रखना सिखा रही है
जबकि वह तीन आठ दो… कुछ भी
लगाकर मगन है…

दूसरी है व्यस्त लकवामारे की कमर
सीधी करने की कोशिश में;
साथ-साथ समझा भी रही है –
पाँव उठेंगे तभी तो चलकर जौनपुर
पहुँच सकोगे।
ज़रा बताओ तो सही- घर के लिए
गाड़ी कहाँ से पकड़ोगे?
और नाम सुनके ‘घर’ का
वह तनिक सिहर-सा उठा है
भले ही उसके पैरों में कोई जुंबिश नज़र नहीं आई अभी तक।

तीसरी ने थमाया है
मरीज़ की हथेली में
स्प्रिंग का शिकंजा-
ज़रूर ही चीजों पर उसकी पकड़
मज़बूत करने को:

“कसो, ढीला छोडो, धीरे-धीरे! बार–बार”…
सबक सीधा और साफ़ था ।

ऐसा करते उसे देख
जब मैंने भी चाहा–
टोकरी में धरी कनियों को
अपनी मुट्ठी में भरूँ…
वे फिसलती चली गईं
जैसे कि उंगलियों में से रेत।

मुझे हताश देख वह बोली-
“रिलैक्स! रखो धीरज…
वक़्त के साथ ही ठीक होगा,
जो भी होगा-
जैसे कि उसी के साथ इतना कुछ
बिगड़ता चला जाता है…”

उसकी पलकों में सिमटे पूरे जीवन को
तो मैं नहीं बाँच पाया-
पर सरल हुआ देख सकना-
वह और उसकी टोली-
कितने मनोयोग से उन्हें नवजीवन देने में
लगी है
जिनमें में किसी को भी उन्होंने
अपनी कोख से नहीं जन्मा।

‘कुछ दवा, कुछ दुआ’-यह तो
सबने पहले भी सुना था-
शरीरोपचार के मरीज़ों ने
उपचार के साथ
दुलार और पुचकार का भी मतलब
अब जाना…

बहुत दिनों बाद…
बल्कि उस क्षण तो यह लगा कि-
जीवन में पहली बार-
एक साथ, एक जगह
इतना अधिक सौंदर्य
मेरी नज़र में आ समाया…

जो मुमकिन है आगे कभी बार-बार
मन में भी कौंधे ।

अपना काम / अजित कुमार – अजित कुमार

 

motivational kavita in hindi #5 हरी हरी दूब पर / अटल बिहारी वाजपेयी

हरी हरी दूब पर
ओस की बूंदे
अभी थी,
अभी नहीं हैं|
ऐसी खुशियाँ
जो हमेशा हमारा साथ दें
कभी नहीं थी,
कहीं नहीं हैं|

क्काँयर की कोख से
फूटा बाल सूर्य,
जब पूरब की गोद में
पाँव फैलाने लगा,
तो मेरी बगीची का
पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा,
मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूँ
या उसके ताप से भाप बनी,
ओस की बुँदों को ढूंढूँ?

सूर्य एक सत्य है
जिसे झुठलाया नहीं जा सकता
मगर ओस भी तो एक सच्चाई है
यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है
क्यों न मैं क्षण क्षण को जिऊँ?
कण-कण मेँ बिखरे सौन्दर्य को पिऊँ?

सूर्य तो फिर भी उगेगा,
धूप तो फिर भी खिलेगी,
लेकिन मेरी बगीची की
हरी-हरी दूब पर,
ओस की बूंद
हर मौसम में नहीं मिलेगी|

हरी हरी दूब पर / अटल बिहारी वाजपेयी – अटल बिहारी वाजपेयी

motivational kavita in hindi #6 ऊँचाई / अटल बिहारी वाजपेयी – अटल बिहारी वाजपेयी

ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,
पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है।

जमती है सिर्फ बर्फ,
जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है।
खेलती, खिलखिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।

ऐसी ऊँचाई,
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे,
ऐसी ऊँचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे,
अभिनंदन की अधिकारी है,
आरोहियों के लिये आमंत्रण है,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,

किन्तु कोई गौरैया,
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
ना कोई थका-मांदा बटोही,
उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है।

सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बँटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं,
मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।

जो जितना ऊँचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।

ज़रूरी यह है कि
ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य,
ठूँठ सा खड़ा न रहे,
औरों से घुले-मिले,
किसी को साथ ले,
किसी के संग चले।

भीड़ में खो जाना,
यादों में डूब जाना,
स्वयं को भूल जाना,
अस्तित्व को अर्थ,
जीवन को सुगंध देता है।

धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें,

किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं,
कि पाँव तले दूब ही न जमे,
कोई काँटा न चुभे,
कोई कली न खिले।

न वसंत हो, न पतझड़,
हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़,
मात्र अकेलेपन का सन्नाटा।

मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
ग़ैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।

ऊँचाई / अटल बिहारी वाजपेयी – अटल बिहारी वाजपेयी

motivational kavita in hindi #7आज ही होगा / बालकृष्ण राव – बालकृष्ण राव

मनाना चाहता है आज ही?
-तो मान ले
त्यौहार का दिन आज ही होगा!

उमंगें यूँ अकारण ही नहीं उठतीं,
न अनदेखे इशारे पर कभी यूँ नाचता मन;
खुले से लग रहे हैं द्वार मंदिर के
बढ़ा पग-
मूर्ति के शृंगार का दिन आज ही होगा!

न जाने आज क्यों दिल चाहता है-
स्वर मिला कर
अनसुने स्वर में किसी की कर उठे जयकार!
न जाने क्यूँ
बिना पाए हुए भी दान याचक मन,
विकल है व्यक्त करने के लिए आभार!

कोई तो, कहीं तो
प्रेरणा का स्रोत होगा ही-
उमंगें यूँ अकारण ही नहीं उठतीं,
नदी में बाढ़ आई है कहीं पानी गिरा होगा!

अचानक शिथिल-बंधन हो रहा है आज
मोक्षासन बंदी मन –
किसी की तो कहीं कोई भगीरथ-साधना पूरी हुई होगी,
किसी भागीरथी के भूमि पर अवतार का दिन आज ही होगा!

मनाना चाहता है आज ही?
-तो मान ले
त्यौहार का दिन आज ही होगा!

आज ही होगा / बालकृष्ण राव – बालकृष्ण राव

motivational kavita in hindi #8 नदी को रास्‍ता किसने दिखाया – बालकृष्ण राव

नदी को रास्‍ता किसने दिखाया?
सिखाया था उसे किसने
कि अपनी भावना के वेग को
उन्‍मुक्‍त बहने दे?
कि वह अपने लिए
खुद खोज लेगी
सिन्धु की गम्भीरता
स्‍वच्‍छन्द बहकर?

इसे हम पूछते आए युगों से,
और सुनते भी युगों से आ रहे उत्‍तर नदी का।
मुझे कोई कभी आया नहीं था राह दिखलाने,
बनाया मार्ग मैने आप ही अपना।
ढकेला था शिलाओं को,
गिरी निर्भिकता से मैं कई ऊँचे प्रपातों से,
वनों में, कंदराओं में,
भटकती, भूलती मैं
फूलती उत्‍साह से प्रत्‍येक बाधा-विघ्‍न को
ठोकर लगाकर, ठेलकर,
बढती गई आगे निरन्तर
एक तट को दूसरे से दूरतर करती।

बढ़ी सम्पन्‍नता के
और अपने दूर-दूर तक फैले साम्राज्‍य के अनुरूप
गति को मन्द कर…
पहुँची जहाँ सागर खडा था
फेन की माला लिए
मेरी प्रतीक्षा में।
यही इतिवृत्‍त मेरा …
मार्ग मैने आप ही बनाया।

मगर भूमि का है दावा,
कि उसने ही बनाया था नदी का मार्ग ,
उसने ही
चलाया था नदी को फिर
जहाँ, जैसे, जिधर चाहा,
शिलाएँ सामने कर दी
जहाँ वह चाहती थी
रास्‍ता बदले नदी,
जरा बाएँ मुड़े
या दाहिने होकर निकल जाए,
स्‍वयं नीची हुई
गति में नदी के
वेग लाने के लिए
बनी समतल
जहाँ चाहा कि उसकी चाल धीमी हो।
बनाती राह,
गति को तीव्र अथवा मन्द करती
जंगलों में और नगरों में नचाती
ले गई भोली नदी को भूमि सागर तक

किधर है सत्‍य?
मन के वेग ने
परिवेश को अपनी सबलता से झुकाकर
रास्‍ता अपना निकाला था,
कि मन के वेग को बहना पडा था बेबस
जिधर परिवेश ने झुककर
स्‍वयं ही राह दे दी थी?
किधर है सत्‍य?

क्‍या आप इसका जबाब देंगे?

नदी को रास्‍ता किसने दिखाया ? / बालकृष्ण राव – बालकृष्ण राव

motivational kavita in hindi #9 ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे / बशीर बद्र – बशीर बद्र

ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे

ख़तावार समझेगी दुनिया तुझे
अब इतनी भी ज़्यादा सफ़ाई न दे

हँसो आज इतना कि इस शोर में
सदा सिसकियों की सुनाई न दे

अभी तो बदन में लहू है बहुत
कलम छीन ले रोशनाई न दे

मुझे अपनी चादर से यूँ ढाँप लो
ज़मीं आसमाँ कुछ दिखाई न दे

ग़ुलामी को बरकत समझने लगें
असीरों को ऐसी रिहाई न दे

मुझे ऐसी जन्नत नहीं चाहिए
जहाँ से मदीना दिखाई न दे

मैं अश्कों से नाम-ए-मुहम्मद लिखूँ
क़लम छीन ले रोशनाई न दे

ख़ुदा ऐसे इरफ़ान का नाम है
रहे सामने और दिखाई न दे

ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे / बशीर बद्र – बशीर बद्र

motivational kavita in hindi #10 मेरे साथ तुम भी दुआ करो / बशीर बद्र – बशीर बद्र

मेरे साथ तुम भी दुआ करो यूँ किसी के हक़ में बुरा न हो
कहीं और हो न ये हादसा कोई रास्ते में जुदा न हो

मेरे घर से रात की सेज तक वो इक आँसू की लकीर है
ज़रा बढ़ के चाँद से पूछना वो इसी तरफ़ से गया न हो

सर-ए-शाम ठहरी हुई ज़मीं, आसमाँ है झुका हुआ
इसी मोड़ पर मेरे वास्ते वो चराग़ ले कर खड़ा न हो

वो फ़रिश्ते आप ही ढूँढिये कहानियों की किताब में
जो बुरा कहें न बुरा सुने कोई शख़्स उन से ख़फ़ा न हो

वो विसाल हो के फ़िराक़ हो तेरी आग महकेगी एक दिन
वो गुलाब बन के खिलेगा क्या जो चराग़ बन के जला न हो

मुझे यूँ लगा कि ख़ामोश ख़ुश्बू के होँठ तितली ने छू लिये
इन्ही ज़र्द पत्तों की ओट में कोई फूल सोया हुआ न हो

इसी एहतियात में मैं रहा, इसी एहतियात में वो रहा
वो कहाँ कहाँ मेरे साथ है किसी और को ये पता न हो

मेरे साथ तुम भी दुआ करो / बशीर बद्र – बशीर बद्र

motivational kavita in hindi #11 आत्म-निर्वासन / धनंजय सिंह – धनंजय सिंह

कहाँ से कहाँ तक चलकर
कहीं भी न पहुँचने का नाम
मेरे लिए यात्रा है
और जैसे
नींद में चलते रहने का नाम जीवन ।
रास्ते की भीड़
जुलूस और उत्सव की चहल-पहल
पिता के रौब से सहमे
बच्चे की तरह
मुझे डिस्टर्ब नहीं करते
बस-ट्रेन
स्कूल-दफ़्तर और घर से जुडी
कुछ छोटी पद-यात्राओं का
एक बहुत बड़ा नाम है ‘दिन’ ।
तुम्हारी याद भी
सो जाती है थक कर
चेतना के द्वार पर पहुँच कर
दस्तक देने से पहले ही ।
सुबह-शाम
दूध माँगने और
हाज़िरी लेने वाली बच्ची
बड़ी हो कर
कुछ कवियों-पत्रकारों और
आलोचकों में बदल गई है ।
पुस्तकों-पत्रिकाओं के ढेर से निकल कर
‘गुमशुदा की तलाश’ के विज्ञापन में
सबसे पहले छपा नाम मेरा है मेरा ……. ।

आत्म-निर्वासन / धनंजय सिंह – धनंजय सिंह

motivational kavita in hindi #12 मौन की चादर / धनंजय सिंह – धनंजय सिंह

आज
पहली बार मैंने,
मौन की चादर बुनी है
काट दो
यदि काट पाओ तार कोई

एक युग से
ज़िन्दगी के घोल को मैं
एक मीठा विष समझ कर पी रहा हूँ
आदमी घबरा न जाए
मुश्क़िलों से
इसलिए मुस्कान बनकर जी रहा हूँ

और यों
अविराम गति से बढ़ रहा हूँ
रुक न जाए
राह में मन हार कोई

बहुत दिन
पहले कभी जब रोशनी थी
चाँदनी ने था
मुझे तब भी बुलाया
नाम चाहे
जो इसे तुम आज दो पर
कोश आँसुओं का
नहीं मैंने लुटाया

तुम किनारे पर खड़े,
आवाज़ मत दो
खींचती मुझको
इधर मँझधार कोई

एक झिलमिल-सा
कवच जो देखते हो
आवरण है यह
उतारूँगा इसे भी
जो अंधेरा
दीपकों की आँख में है
एक दिन मैं ही
उजारूँगा उसे भी

यों प्रकाशित
दिव्यता होगी हृदय की
है न जिसके द्वार
वन्दनवार कोई

नित्य ही होता
हृदयगत भाव का संयत प्रकाशन
किन्तु मैं
अनुवाद कर पाता नहीं हूँ
जो स्वयं ही
हाथ से छूटे छिटककर
उन क्षणों को
याद कर पाता नहीं हूँ

यों लिए
वीणा सदा फिरता रहा हूँ
बाँध ले
शायद तुम्हें झनकार कोई

मौन की चादर / धनंजय सिंह – धनंजय सिंह

motivational kavita in hindi #13 नहीं झुकता, झुकाता भी नहीं हूँ / धनंजय सिंह – धनंजय सिंह

नहीं झुकता, झुकाता भी नहीं हूँ
जो सच है वो, छिपाता भी नहीं हूँ

जहाँ सादर नहीं जाता बुलाया
मैं उस दरबार जाता भी नहीं हूँ

जो नगमे जाग उठते हैं हृदय में
कभी उनको सुलाता भी नहीं हूँ

नहीं आता मुझे ग़म को छिपाना
पर उसके गीत गाता भी नहीं हूँ

किसी ने यदि किया उपकार कोई
उसे मैं भूल पाता भी नहीं हूँ

किसी के यदि कभी मैं काम आऊँ
कभी उसको भुलाता भी नहीं हूँ

जो अपनेपन को दुर्बलता समझ ले
मैं उसके पास जाता भी नहीं हूँ

जो ख़ुद को स्वयंभू अवतार माने
उसे अपना बनाता भी नहीं हूँ

नहीं झुकता, झुकाता भी नहीं हूँ / धनंजय सिंह – धनंजय सिंह

motivational poem in hindi #14 सच न बोलना / नागार्जुन – नागार्जुन

मलाबार के खेतिहरों को अन्न चाहिए खाने को,
डंडपाणि को लठ्ठ चाहिए बिगड़ी बात बनाने को!
जंगल में जाकर देखा, नहीं एक भी बांस दिखा!
सभी कट गए सुना, देश को पुलिस रही सबक सिखा!

जन-गण-मन अधिनायक जय हो, प्रजा विचित्र तुम्हारी है
भूख-भूख चिल्लाने वाली अशुभ अमंगलकारी है!
बंद सेल, बेगूसराय में नौजवान दो भले मरे
जगह नहीं है जेलों में, यमराज तुम्हारी मदद करे।

ख्याल करो मत जनसाधारण की रोज़ी का, रोटी का,
फाड़-फाड़ कर गला, न कब से मना कर रहा अमरीका!
बापू की प्रतिमा के आगे शंख और घड़ियाल बजे!
भुखमरों के कंकालों पर रंग-बिरंगी साज़ सजे!

ज़मींदार है, साहुकार है, बनिया है, व्योपारी है,
अंदर-अंदर विकट कसाई, बाहर खद्दरधारी है!
सब घुस आए भरा पड़ा है, भारतमाता का मंदिर
एक बार जो फिसले अगुआ, फिसल रहे हैं फिर-फिर-फिर!

छुट्टा घूमें डाकू गुंडे, छुट्टा घूमें हत्यारे,
देखो, हंटर भांज रहे हैं जस के तस ज़ालिम सारे!
जो कोई इनके खिलाफ़ अंगुली उठाएगा बोलेगा,
काल कोठरी में ही जाकर फिर वह सत्तू घोलेगा!

माताओं पर, बहिनों पर, घोड़े दौड़ाए जाते हैं!
बच्चे, बूढ़े-बाप तक न छूटते, सताए जाते हैं!
मार-पीट है, लूट-पाट है, तहस-नहस बरबादी है,
ज़ोर-जुलम है, जेल-सेल है। वाह खूब आज़ादी है!

रोज़ी-रोटी, हक की बातें जो भी मुंह पर लाएगा,
कोई भी हो, निश्चय ही वह कम्युनिस्ट कहलाएगा!
नेहरू चाहे जिन्ना, उसको माफ़ करेंगे कभी नहीं,
जेलों में ही जगह मिलेगी, जाएगा वह जहां कहीं!

सपने में भी सच न बोलना, वर्ना पकड़े जाओगे,
भैया, लखनऊ-दिल्ली पहुंचो, मेवा-मिसरी पाओगे!
माल मिलेगा रेत सको यदि गला मजूर-किसानों का,
हम मर-भुक्खों से क्या होगा, चरण गहो श्रीमानों का!

सच न बोलना / नागार्जुन – नागार्जुन

motivational poem in hindi #15 सत्य / नागार्जुन – नागार्जुन

सत्य को लकवा मार गया है
वह लंबे काठ की तरह
पड़ा रहता है सारा दिन, सारी रात
वह फटी–फटी आँखों से
टुकुर–टुकुर ताकता रहता है सारा दिन, सारी रात
कोई भी सामने से आए–जाए
सत्य की सूनी निगाहों में जरा भी फर्क नहीं पड़ता
पथराई नज़रों से वह यों ही देखता रहेगा
सारा–सारा दिन, सारी–सारी रात

सत्य को लकवा मार गया है
गले से ऊपरवाली मशीनरी पूरी तरह बेकार हो गई है
सोचना बंद
समझना बंद
याद करना बंद
याद रखना बंद
दिमाग की रगों में ज़रा भी हरकत नहीं होती
सत्य को लकवा मार गया है
कौर अंदर डालकर जबड़ों को झटका देना पड़ता है
तब जाकर खाना गले के अंदर उतरता है
ऊपरवाली मशीनरी पूरी तरह बेकार हो गई है
सत्य को लकवा मार गया है

वह लंबे काठ की तरह पड़ा रहता है
सारा–सारा दिन, सारी–सारी रात
वह आपका हाथ थामे रहेगा देर तक
वह आपकी ओर देखता रहेगा देर तक
वह आपकी बातें सुनता रहेगा देर तक
लेकिन लगेगा नहीं कि उसने आपको पहचान लिया है

जी नहीं, सत्य आपको बिल्कुल नहीं पहचानेगा
पहचान की उसकी क्षमता हमेशा के लिए लुप्त हो चुकी है
जी हाँ, सत्य को लकवा मार गया है
उसे इमर्जेंसी का शाक लगा है
लगता है, अब वह किसी काम का न रहा
जी हाँ, सत्य अब पड़ा रहेगा
लोथ की तरह, स्पंदनशून्य मांसल देह की तरह!

सत्य / नागार्जुन – नागार्जुन

motivational poem in hindi #16 जी हाँ , लिख रहा हूँ / नागार्जुन – नागार्जुन

जी हाँ, लिख रहा हूँ …
बहुत कुछ! बहोत बहोत!!
ढेर ढेर सा लिख रहा हूँ!
मगर , आप उसे पढ़ नहीं
पाओगे … देख नहीं सकोगे
उसे आप!

दरअसल बात यह है कि
इन दिनों अपनी लिखावट
आप भी मैं कहॉ पढ़ पाता हूँ
नियोन-राड पर उभरती पंक्तियों की
तरह वो अगले ही क्षण
गुम हो जाती हैं
चेतना के ‘की-बोर्ड’ पर वो बस
दो-चार सेकेंड तक ही
टिकती है ….
कभी-कभार ही अपनी इस
लिखावट को कागज़ पर
नोट कर पता हूँ
स्पन्दनशील संवेदन की
क्षण-भंगुर लड़ियाँ
सहेजकर उन्हें और तक
पहुँचाना!
बाप रे , कितना मुश्किल है!
आप तो ‘फोर-फिगर’ मासिक –
वेतन वाले उच्च-अधिकारी ठहरे,
मन-ही-मन तो हसोंगे ही,
की भला यह भी कोई
काम हुआ , की अनाप-
शनाप ख़यालों की
महीन लफ्फाजी ही
करता चले कोई –
यह भी कोई काम हुआ भला!

जी हाँ , लिख रहा हूँ / नागार्जुन – नागार्जुन

motivational poem in hindi #17 कल फिर सुबह नई होगी / रामदरश मिश्र – रामदरश मिश्र

दिन को ही हो गई रात-सी, लगता कालजयी होगी
कविता बोली- “मत उदास हो, कल फिर सुबह नई होगी।”

गली-गली कूड़ा बटोरता, देखो बचपन बेचारा
टूटे हुए ख्वाब लादे, फिरता यौवन का बनजारा
कहीं बुढ़ापे की तनहाई, करती दई-दई होगी!

जलती हुई हवाएँ मार रही हैं चाँटे पर चाँटा
लेट गया है खेतों ऊपर यह जलता-सा सन्नाटा
फिर भी लगता है कहीं पर श्याम घटा उनई होगी!

सोया है दुर्गम भविष्य चट्टान सरीखा दूर तलक
जाना है उस पार मगर आँखें रुक जाती हैं थक-थक
खोजो यारो, सूने में भी कोई राह गई होगी!

टूटे तारों से हिलते हैं यहाँ-वहाँ रिश्ते-नाते
शब्द ठहर जाते सहसा इक-दूजे में आते-जाते
फिर भी जाने क्यों लगता- कल धरती छंदमयी होगी!

कल फिर सुबह नई होगी / रामदरश मिश्र – रामदरश मिश्र

motivational poem in hindi for student #18 आभारी हूँ बहुत दोस्तों / रामदरश मिश्र – रामदरश मिश्र

आभारी हूँ बहुत दोस्तो, मुझे तुम्हारा प्यार मिला
सुख में, दुख में, हार-जीत में एक नहीं सौ बार मिला!

सावन गरजा, भादों बरसा, घिर-घिर आई अँधियारी
कीचड़-कांदों से लथपथ हो, बोझ हुई घड़ियाँ सारी
तुम आए तो लगा कि कोई कातिक का त्योहार मिला!

इतना लम्बा सफ़र रहा, थे मोड़ भयानक राहों में
ठोकर लगी, लड़खड़ाया, फिर गिरा तुम्हारी बाँहों में
तुम थे तो मेरे पाँवों को छिन-छिनकर आधार मिला!

आया नहीं फ़रिश्ता कोई, मुझको कभी दुआ देने
मैंने भी कब चाहा, दूँ इनको अपनी नौका खेने
बहे हवा-से तुम, साँसों को सुन्दर बंदनवार मिला!

हर पल लगता रहा कि तुम हो पास कहीं दाएँ-बाएँ
तुम हो साथ सदा तो आवारा सुख-दुख आए-जाए
मृत्यु-गंध से भरे समय में जीवन का स्वीकार मिला!

आभारी हूँ बहुत दोस्तों / रामदरश मिश्र – रामदरश मिश्र

motivational poem in hindi for student #19 जो कुटिलता से जियेंगे / बालकवि बैरागी – बालकवि बैरागी

छीनकर छ्लछंद से
हक पराया मारकर
अम्रित पिया तो क्या पिया?
हो गये बेशक अमर
जी रहे अम्रित उमर
लेकिन अभय अनमोल
सारा छिन गया ।
देवता तो हो गये पर
क्या हुआ देवत्व का?
आयुभर चिन्ता करो अब
पद प्रतिष्टा,राजसत्ता
और अपने लोक की!
छिन नहीं जाए सुधा सिंहासनों की
एक हि भय
रात दिन आठों प्रहर
प्राण में बैठा रहे–
इस भयातुर अमर
जीवन का करो क्या?

जो किसि षड्यंत्र मे
छलछंद में शामिल नहीं था
पी गया सारा हलाहल
हो गया कैसे अमर?
पा गया साम्राज्य
’शिव’- संग्या सहित
शिवलोक का —
कर रहा कल्याण सारे विश्व का!

सुर – असुर सब पूजते
उसको निरंतर
साध्य सबका बन गया
कर्म मे कोई कलुष
जिसके नहीं है
शीश पर नीलाभ नभ
खुद छत्र बनकर तन गया!

जो कुटिलता से जियेंगे
वे सदा विचलित रहेंगे
त्राण-त्राता के लिये
मारे फिरेंगे!

हक पराया मारकर
छलछंद से छीना हुआ
अम्रित अगर मिल भी गया तो
आप उसका पान करके
उम्र भर फिर क्या करेंगे?

जो कुटिलता से जियेंगे / बालकवि बैरागी – बालकवि बैरागी

motivational poem in hindi for student #20 सारा देश हमारा / बालकवि बैरागी – बालकवि बैरागी

केरल से कारगिल घाटी तक
गोहाटी से चौपाटी तक
सारा देश हमारा
जीना हो तो मरना सीखो
गूंज उठे यह नारा
सारा देश हमारा
केरल से कारगिल घाटी तक…

लगता है ताजे कोल्हू पर जमी हुई है काई
लगता है फिर भटक गई है भारत की तरुणाई
कोई चीरो ओ रणधीरो!
ओ जननी के भाग्य लकीरों!
बलिदानों का पुण्य मुहूरत आता नहीं दुबारा
जीना हो तो मरना सीखो गूंज उठे यह नारा
सारा देश हमारा
केरल से कारगिल घाटी तक…

घायल अपना ताजमहल है ,घायल गंगा मैया
टूट रहे हैं तूफानों में नैया और खेवैया
तुम नैया के पाल बदल दो
तूफानों की चाल बदल दो
हर आंधी का उतार हो तुम,तुमने नहीं विचारा
जीना हो तो मरना सीखो गूंज उठे यह नारा
सारा देश हमारा
केरल से कारगिल घाटी तक…

कहीं तुम्हें परवत लड़वा दे ,कहीं लड़ा दे पानी
भाषा के नारों में गम है ,मन की मीठी वाणी
आग दो इन नारों में
इज्ज़त आ गई बाजारों में
कब जागेंगे सोये सूरज! कब होगा उजियारा
जीना हो तो मरना सीखो गूंज उठे यह नारा
सारा देश हमारा
केरल से कारगिल घाटी तक…

संकट अपना बाल सखा है इसको कंठ लगाओ
क्या बैठे हो न्यारे-न्यारे मिलकर बोझ उठाओ
भाग्य भरोसा कायरता है
कर्मठ देश कहाँ मरता है
सोचो तुमने इतने दिन में कितनी बार हुंकारा
जीना हो तो मरना सीखो गूंज उठे यह नारा
सारा देश हमारा
केरल से कारगिल घाटी तक…

सारा देश हमारा / बालकवि बैरागी – बालकवि बैरागी

motivational kavita in hindi #21 जिन्दगी इक तलाश है क्या है? / अमित – अमिताभ त्रिपाठी ‘अमित’

जिन्दगी इक तलाश है, क्या है?
दर्द इसका लिबास है क्या है?

फिर हवा ज़हर पी के आई क्या,
सारा आलम उदास है, क्या है?

एक सच के हजार चेहरें हैं,
अपना-अपना क़यास है, क्या है

जबकि दिल ही मुकाम है रब का,
इक जमीं फिर भी ख़ास है, क्या है

राम-ओ-रहमान की हिफ़ाजत में,
आदमी! बदहवास है, क्या है?

सुधर तो सकती है दुनियाँ, लेकिन
हाल, माज़ी का दास है, क्या है

मिटा रहा है जमाना इसे जाने कब से,
इक बला है कि प्यास है, क्या है?

गौर करता हूँ तो आती है हँसी,
ये जो सब आस पास है क्या है?

जिन्दगी इक तलाश है क्या है? / अमित – अमिताभ त्रिपाठी ‘अमित’

motivational kavita in hindi #22 सुन रहा हूँ इसलिये उल्लू बनाना चाहते हैं / अमित – अमिताभ त्रिपाठी ‘अमित’

व्यर्थ की संवेदनाओं से डराना चाहते हैं
सुन रहा हूँ इसलिये उल्लू बनाना चाहते हैं

मेरे जीवन की समस्याओं के साये में कहीं
अपने कुत्तों के लिये भी अशियाना चाहते हैं

धूप से नज़रे चुराते हैं पसीनों के अमीर
किसके मुस्तकबिल को फूलों से सजाना चाहते हैं

मेरे क़तरों की बदौलत जिनकी कोठी है बुलन्द
वक़्त पर मेरे ही पीछे सिर छुपाना चाहते हैं

कितने बेमानी से लगते हैं वो नारे दिल-फ़रेब
कितनी बेशर्मी से वो परचम उठाना चाहते हैं

सुन रहा हूँ इसलिये उल्लू बनाना चाहते हैं / अमित – अमिताभ त्रिपाठी ‘अमित’

motivational kavita in hindi #23 पहली पेंशन /अनामिका – अनामिका

श्रीमती कार्लेकर
अपनी पहली पेंशन लेकर
जब घर लौटीं–
सारी निलम्बित इच्छाएँ
अपना दावा पेश करने लगीं।

जहाँ जो भी टोकरी उठाई
उसके नीचे छोटी चुहियों-सी
दबी-पड़ी दीख गई कितनी इच्छाएँ!

श्रीमती कार्लेकर उलझन में पड़ीं
क्या-क्या ख़रीदें, किससे कैसे निबटें!
सूझा नहीं कुछ तो झाड़न उठाई
झाड़ आईं सब टोकरियाँ बाहर
चूहेदानी में इच्छाएँ फँसाईं
(हुलर-मुलर सारी इच्छाएँ)
और कहा कार्लेकर साहब से–
“चलो ज़रा, गंगा नहा आएँ!”

पहली पेंशन /अनामिका – अनामिका

motivational kavita in hindi #24 कूड़ा बीनते बच्चे / अनामिका – अनामिका

उन्हें हमेशा जल्दी रहती है
उनके पेट में चूहे कूदते हैं
और खून में दौड़ती है गिलहरी!
बड़े-बड़े डग भरते
चलते हैं वे तो
उनका ढीला-ढाला कुर्ता
तन जाता है फूलकर उनके पीछे
जैसे कि हो पाल कश्ती का!
बोरियों में टनन-टनन गाती हुई
रम की बोतलें
उनकी झुकी पीठ की रीढ़ से
कभी-कभी कहती हैं-
“कैसी हो”,”कैसा है मंडी का हाल?”
बढ़ते-बढ़ते
चले जाते हैं वे
पाताल तक
और वहाँ लग्गी लगाकर
बैंगन तोड़ने वाले
बौनों के वास्ते
बना देते हैं
माचिस के खाली डिब्बों के
छोटे-छोटे कई घर
खुद तो वे कहीं नहीं रहते,
पर उन्हें पता है घर का मतलब!
वे देखते हैं कि अकसर
चींते भी कूड़े के ठोंगों से पेड़ा खुरचकर
ले जाते हैं अपने घर!
ईश्वर अपना चश्मा पोंछता है
सिगरेट की पन्नी उनसे ही लेकर।

कूड़ा बीनते बच्चे / अनामिका – अनामिका

motivational kavita in hindi #25 पुस्तकालय में झपकी / अनामिका – अनामिका

गर्मी गज़ब है!
चैन से जरा ऊंघ पाने की
इससे ज़्यादा सुरिक्षत, ठंडी, शांत जगह
धरती पर दूसरी नहीं शायद ।

गैलिस की पतलून,
ढीले पैतावे पहने
रोज़ आते हैं जो
नियत समय पर यहां ऊंघने

वे वृद्ध गोरियो, किंग लियर,
भीष्म पितामह और विदुर वगैरह अपने साग-वाग
लिए-दिए आते हैं
छोटे टिफ़न में।

टायलेट में जाकर मांजते हैं देर तलक
अपना टिफन बाक्स खाने के बाद।
बहुत देर में चुनते हैं अपने-लायक
मोटे हर्फों वाली पतली किताब,
उत्साह से पढ़ते है पृष्ठ दो-चार
देखते हैं पढ़कर
ठीक बैठा कि नहीं बैठा
चश्मे का नंबर।

वे जिसके बारे में पढ़ते हैं-
वो ही हो जाते हैं अक्सर-
बारी-बारी से अशोक, बुद्ध, अकबर।
मधुबाला, नूतन की चाल-ढाल,
पृथ्वी कपूर और उनकी औलादों के तेवर
ढूंढा करते हैं वे इधर-उधर
और फिर थककर सो जाते हैं कुर्सी पर।

मुंह खोल सोए हुए बूढ़े
दुनिया की प्राचीनतम
पांडुलिपियों से झड़ी
धूल फांकते-फांकते
खुद ही हो जाते हैं जीर्ण-शीर्ण भूजर्पत्र!

कभी-कभी हवा छेड़ती है इन्हें,
गौरैया उड़ती-फुड़ती
इन पर कर जाती है
नन्हें पंजों से हस्ताक्षर।

क्या कोई राहुल सांस्कृतायन आएगा
और जिह्वार्ग किए इन्हें लिए जाएगा
तिब्बत की सीमा के पार?

पुस्तकालय में झपकी / अनामिका – अनामिका

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